कल्पवृक्ष का बीज बोना by light of spiritual

बीज बोना

योग हैं जड़, और जड़े आकर्षित नहीं होती 

जब कोई बीज बोया जाता है तो उसे थोड़ा सा मिट्टी से ढक देते हैं अर्थात बीज दिखाई न दे, कुछ समय बाद अंकुर निकलता है और वही अंकुर जमीन में चला जाता है और जड़ बनाता है बीजपत्र के बीच से फिर अंकुर निकलता है वह वृक्ष बन जाता है

यह संसार कल्पवृक्ष है, इसका बीज परमात्मा शिव ऊपर परमधाम से आया, नीचे शरीर रूपी मिट्टी ब्रह्मा के तन से ढका है, उसे ब्रह्मा ने ही देख पाया है

ब्रह्मा में नया परिवर्तन रूपी अंकुर सभी ने देखा । नया अंकुरण देख अनेक विध्न रूपी चिड़ियों ने खाने की कोशिश की किन्तु खा न सकी और वही अंकुरण जमीन में जड़ो का रूप बन गया अर्थात ब्रह्मा अदृश्य सूक्ष्म आकारी बन गये

जो बीजपत्र की ऊपर बृद्धि हुई वह हराभरा वृक्ष बन गया और वृक्ष का फैलाव व जमाव जड़ो पर निर्भर करता है
अत: जितनी आत्माए सूक्ष्म शरीर में ब्रह्मा सरस्वती के साथ तीव्र सेवा कर रही है उतना ही वृक्ष विशाल होता चला गया

जड़ो का रंग आकर्षित नहीं होता किन्तु तना, पत्ती, फूल, फल आकर्षित होते हैं यही कारण है कि अच्छा – अच्छा कहने वाले बहुत सारे हैं किन्तु बीजरूप स्थिति वाली योगी व प्रयोगी पसंद आत्माए कम है या ऐसा कहे कि आश्रम, ज्ञान, प्रोग्राम,भजन ,मंदिर आदि सब अच्छा लगता है किन्तु योग की स्थिति अच्छी नहीं होती

क्योंकि योग हैं जड़, और जड़े आकर्षित नहीं होती ।

इस प्रकार इस सारे संसार रूपी कल्पवृक्ष की रचना भी ठीक एक संसारिक वृक्ष की भाति होती हैं
सारे कल्प के लिए हमें जो भी चाहिए वह बीज रूप में गुप्त रूप से बोते रहना हैं।
तन, मन, धन, संकल्प, शक्ति, समय सब कुछ गुप्त रूप से सेवा में लगाना हैं तभी मजबूत कल्पवृक्ष प्राप्त होगा

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