गीता के महावाक्य – भगवानोवाच

गीता के महावाक्य – भगवानोवाच

 



भगवानोवाच – देह सहित देह के सब धर्मों को भूलकर सिर्फ मुझे याद कर , तो मैं तुझे सब पापों से मुक्त कर दूँगा 

 

गीता के इस महावाक्य पर थोड़ा विचार करते हैं
क्योंकि सिर्फ इस महावाक्य में ही संपूर्ण गीता का सार समाहित है , अगर सिर्फ इसे समझ लिया तो और कुछ समझना शेष नहीं रहेगा l

 

भूलना क्या है , पहला वाक्य है , देह सहित , बहुत ही अदभुत बात है ,इतना आसान नहीं है ,अनेक जन्मों से देह में आते आते , स्वयम को सिर्फ देह समझ बैठे , तब भूलें कैसे , और याद क्या करें , आखिर मैं हूँ कौन ,जब तक इस पर विचार नहीं होगा ,तो कुछ हासिल नहीं होने वाला , मैं कौन मेरा कौन , ये स्मृति जब तक नहीं होगी ,तब तक हम सिर्फ स्वयम को ठग रहे हैं l

 



आखिर कौन हूँ मैं , क्या इस पांच तत्व से बना हुआ पुतला ….? यही तो समझ लिया है मैंने ,बस सदा यही तो स्मृति में है , तब क्या भूलना इतना आसान होगा …?
विचार करें , ये देह तो पहले भी नहीं थी , बाद में भी नहीं होगी , देह तो वस्त्र है मेरा , उतारा और पहना , नया मिला , फिर पुराना हुआ , फिर उतारा ,फेंक दिया , फिर नया मिला ,फिर उतारा फेंक दिया , पता नहीं कितनी बार , कितने जन्म लिये , कितने माँ , बाप , भाई , बहिन चाचा , मामा , ताऊ मिले , अनेक जन्म ,अलग अलग ,पर अब तो सिर्फ ,यही जन्म का याद रहा , पिछला तो भूल गया , अब याद क्या रहा , इस जन्म का वस्त्र , हाँ ये शरीर , वस्त्र ही तो है , बिलकुल याद आ गया , मैं तो चैतन्य शक्ति आत्मा हूँ , इस देह की भ्रिकुटी में विराजमान सूक्ष्म स्टार , ज्योतिस्वरूप अनंत शक्तियों से भरपूर , याद आया , बिन्दु रुप , निराकार स्थूल आँखों से न दिखने वाली , तो पहचान मिली आत्मा की भृकुटि में चमकती हुई l

 

वस्त्र अलग मैं अलग

अब दूसरा चरण शुरू ….मैं चैतन्य शक्ति आत्मा तो मेरा बाप कौन , ज़रूर मेरे जैसा होगा , वो वस्त्र थोड़े ही होगा ..?? वह भी चमकता हुआ स्टार ,ज्योतिस्वरूप सर्वशक्तिमान परमात्मा ,यही है ज्ञान का तीसरा नेत्र ..l
बस स्मृति आ गई , अब कितनी देर इस स्मृति में टिक पाता हूँ , यही है साधना , यही है संपूर्ण गीता का सार l और यही है , मन्मनाभव , का महामंत्र l और यही है भारत का प्राचीन राजयोग ,जिसे स्वयं परमात्मा ने सिखाया था ,और जिसे मनुष्य भूल चुके हैं ,एक है हठयोग ,जिसमें शरीर के स्वास्थ्य का राज है ,जैसे अंगों को मोड़ना ,दूसरा है राजयोग ,जिसमें आत्मा की उन्नति का राज है ,स्वयं को जानना और सर्व शक्तिमान परमात्मा को जानकर उनसे संबंध जोड़ना ,उनसे शक्तियां प्राप्त करना , इसीलिये इसे सहज राजयोग भी कहा है ,जिसे स्वंय वर्तमान समय शिव परमात्मा द्वारा प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय के माध्यम से सिखाया जा रहा है ,इसलिये आप सभी को हार्दिक निमंत्रण है आइये खुद को जानें ,स्वयं की और परमात्मा की सत्य पहचान प्राप्त करें ,और जीवन को हीरे तुल्य बनायेंl

 

ओम शांति




 



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