प्रभु की भक्ति by light of spiritual

प्रभु की भक्ति

प्रभु की भक्ति इस प्रकार होनी चाहिए, जिस प्रकार भौंरा पराग की खुशबू में मस्त होकर कमल के अंदर बंद हो जाता हैं, फिर सुबह होने पर भी उसी पर मंडराता रहता है, फिर बंद हो जाता है उस तल्लीनता में दिन और रात का पता ही नहीं चलता वल्कि वह यह महसूस ही नहीं करता कि वह कब घूमता हैं और कब बंद हो जाता हैं

ठीक इसी प्रकार से मन एक भौंरा है यह आत्मा परमात्मा एक कमल के समान है जिसमें खुशबू ही खुशबू है अगर हमारा मन अन्य तुच्छ फूलो की खुशबू से हटकर आत्मिक शान्ति, परमात्मिक प्राप्ति कमल रूपी फूल की खुशबू लेने में मस्त रहें तो यह मन रूपी भौंरा रात दिन की तपस्या से भी दूर जा सकता हैं दिन-रात माना सुख:दुख ,अपना:पराया,आत्मा-परमात्मा में कोई अंतर नहीं रह जाता । जब हमारा चंचल मन भौंरा आत्मिक कमल स्थिति में रस युक्त हो जाता हैं तो सारे विकार पीछे छूट जाते हैं

यह भवसागर जिसमें अनेको आत्मा रूपी कमल और मन रूपी भौरे हैं, किन्तु मन रूपी भौंरा आत्मिक कमल के पास होते हुए भी विना सुगंध वाले पुष्पो की ओर आकर्षित होकर आत्मा की आवाज़ नहीं सुन पाता ।अत: कमल की सुगंध का भी आभास नहीं हो पाता । और उसे तुच्छ फूलो के पास रहकर उसके मन में नयी-नयी इच्छाये उत्पन्न होती है और उनकी पूर्ति के लिए सारे भवसागर में इन्द्रिय सुख की पूर्ति के लिए तुच्छ फूलो की सुगंध लेकर भटकता रहता और सोचता हैं कि शायद इस फूल की सुगंध से उसे संतुष्टि होगी लेकिन ऐसा नहीं होता । वह इन्द्रिय सुख के लिए कभी इस फूल पर कभी उस फूल पर भटकता रहता है

किन्तु भौंरा रूपी मन जैसे ही कमल रूपी परमात्मा के पास जाता है तो फिर कोई इच्छा नहीं रह जाती संतुष्टि मिलती है और वह स्थित होकर बस परमात्म मार्ग पर चलता है फिर वह आत्मा अन्य आत्माओ को परमात्मा की प्राप्ति हेतु मार्ग भी दिखलाती हैं जिसे हम महान आत्मा, देवात्मा यहॉ तक की भगवान कहकर पुकारने लगते हैं

ऊँ शान्ति ऊँ शान्ति ऊँ शान्ति

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