ब्रह्मचर्य का सहीं मतलब

ब्रह्मचर्य का सहीं मतलब

 

ब्रह्मचर्य,धार्मिक अध्ययन और आत्म -संयम का जीवन ब्रह्मचर्य कहलाता हैं।
ऐसा माना जाता है कि वीर्य की कमी होने से मृत्यु हो जाती हैं । वीर्य के संरक्षण से योगी का शरीर एक मीठा गंध विकसित करता है । जब तक इसे बरकरार रखा जाता हैं, तब तक मृत्यु का डर नही रहता । ब्रह्मचर्य की अवधारणा अस्वाद, मजबूत तपस्या और निषेध में से एक नहीं है ।

 



दूसरे शब्दों में जो सभी में दिव्यता को देखता हैं वह एक ब्राह्मण हैं । हालांकि, पतंजलि शरीर, मन व दिमाग पर तपाव डालती हैं । इसका मतलब यह नहीं कि योग दर्शन केवल किसी व्यक्ति विशेष के लिए हैं । ब्रह्मचर्य के साथ इसका कोई संबंध नहीं है कि कोई अविवाहित हैं या विवाहित, और पारिवारिक जीवन जी रहा हैं । अपने दैनिक जीवन में ब्रह्मचर्य के उच्च पहलुओं को विकसित करना होगा ।

किसी को मोक्ष के लिए अविवाहित रहनें और घर के बिना रहने की जरूरत नहीं है । मानव प्रेम और खुशी का अनुभव किए बिना, दिव्य प्रेम को नहीं जान सकता ।

भारत में लगभग ज्यादातर योगी विवाहित थे । उन्होंने अपनी सामाजिक या नैतिक जिम्मेदारी को नहीं त्यागा ।

 



इच्छुक व्यक्ति की स्थिति से निपटना जो कि गृहस्थ है, शिव संहिता में कहना है कि उसे सेवानिवृत्त जगह में पुरुषों की संगति से मुक्त करने का अभ्यास करना चाहिए । उपस्थिति के लिए उसे समाज में रहना चाहिए । अपने व्यवसाय, समाज के नियमों को नही त्यागना चाहिए । लेकिन लोगों को भी उनके ब्रह्मचारी के जीवन में दखल नहीं देना चाहिए। वह समझदारी से योग की विधि का पालन करने में सफल होता हैं इसमें कोई संदेह नहीं है परिवार के बीच रहते हुए, हमेशा घर के कर्तव्यों का पालन करते हुए, वह दोषो से मुक्त रहें । इन्द्रियों को वश में रखता है तो मोक्ष को प्राप्त होता है।

योग का अभ्यास करने वाले गृहस्थ को मानव जाति की रक्षा करने के लिए समाज स्वीकार करता है । तथा समाज में मान सम्मान और भी पाता हैं । समाज उसे किसी प्रकार से प्रदूषित नहीं करता है ।

जब ब्राह्मण्य में कोई विस्थापित होता हैं, तो कोई व्यक्ति जीवन शक्ति और ऊर्जा, एक सहासी दिमाग और एक शक्तिशाली बुद्धि का एक फंड विकसित करता हैं । ताकि कोई भी किसी प्रकार के अन्याय से लड़ सकें ।
ब्रह्मचारी उन बलो का प्रयोग करेंगे जो वह बुद्धिमानी से उत्पन करेंगें । वह भौतिक लोगों को भगवान के काम, संस्कृति के प्रसार के लिए मानसिक और आध्यात्मिक जीवन के विकास के लिए बौद्धिक उपयोग करने के लिए उपयोग करेंगे ।

 

ब्रह्मचर्य एक बैटरी की तरह काम करती हैं जो ज्ञान के प्रकाश को चमकाता हैं ।

कर्मयोग के अनुसार गृहस्थ में रहकर संतान उत्पत्ति के लिए संबंध बनाना योग हैं । लेकिन शारीरिक खुश के लिए संबंध बनाना भोग कहलाता हैं।

आज कलयुग में यदि गृहस्थ जीवन मे रहकर केवल अपनी अर्धांगिनी के साथ संबंध रहे तो मानव, योग का जीवन जी रहा है,यानी ब्रह्मचर्य का जीवन यापन कर रहा है यदि अर्धांगिनी के अलावा किसी अन्य के साथ संबंध रहे तो वह ब्रह्मचर्य नही बल्कि भोगी जीवन जी रहा है ।

 

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