रक्षाबंधन पांच संकल्पों के साथ मनायें

रक्षाबंधन पांच संकल्पों के साथ मनायें

 





 

1. कर्म

 मनुष्य का कर्म उसके संकल्पों का आईना है। हमारे कर्म में उपरोक्त चारो चीजें आ जाती हैं। हमारी सोच, हमारे बोल, हमारे भाव, सब उसके द्वारा दर्शाये जाते हैं। इसलिए कर्म करते हुए इस बात का ज़रूर ध्यान रखना है कि हर कर्म की प्रतिक्रिया ज़रूर होती है। जो किया है वही लौट कर आयेगा और निश्चित रूप से आयेगा। इसलिए हर कर्म के महत्व और मर्म को जानकर, उसपर विशेष ध्यान देकर रक्षाबंधन को संकल्प की धारणा से यादगार बनायें। तो स्वयं ही हम अपनी रक्षा कर लेते हैं। ये है इस त्योहार का परमात्मा के साथ गहरा सम्बंध इसलिए एकमात्र सहारा है। परमात्मा, जो हर विपत्तियों से, बुराइयों से, विकारों से, पवित्रता के आधार से हमारी रक्षा करता और करवा सकता है। 

 



 

2. वृत्ति

किसी भी संकल्प को बार-बार दोहराने से वृत्ति का निर्माण होता है। और आज सबसे बड़ी वृत्ति  दुनिया में देह और देह से सम्बंधित चीजों के साथ जुड़ी हुई है। उदाहरण के लिए जैसे ये पंजाबी है, गुजराती  है, मराठी है, बंगाली है या ये इस पद पर है या ये इस जाति का हैं या नीच जाति का हैं हमारे संकल्पों को खराब कर रहा है। इसलिए वृत्ति में यही डलो कि यह देह नहीं, सुंदर सी चैतन्य शक्ति आत्मा है। इससे हमारा वातावरण शक्तिशाली बन जायेगा।

 



 

 

3. निमित्तपन का अभ्यास

 हमारे परिवार में हम किसी के पिता हो सकते हैं, किसी के पति हो सकते हैं, किसी के पुत्र हो सकते हैं। ये आपका एक अनुवांशिक या जैविक पिता या जैविक बंधन का संकेत है, आप मालिक नहीं हैं उस व्यक्ति के या उस वस्तु के। आप निमित्त मात्र उसकी देखरेख के लिए हैं। निमित्तपन का भाव पवित्रता के आधार से आता है। जो जितना अपने आप को केयर टेकर समझता है, वो उतना ज्यादा अपने आप को इस रूहानी पर्सनैलिटी के साथ जोड़ पाता है। नहीं तो आज दुःख का सबसे बड़ा कारण है।

अभिमान, ये मैं करवा रहा हूँ, मैं नहीं होता तो कुछ नहीं होता, मैं तुम्हारे लिए सब कुछ कर रहा हूँ। अरे भाई, वो व्यक्ति आपका नहीं खा रहा है, अपने भाग्य का खा रहा है। आप रहेंगे तब भी खायेगा, आप नहीं रहेंगे तब भी खायेगा। इस निमित्तपन के भाव से आप बंधनमुक्त रहते हैं शक्तिशाली रहते हैं। 



 

4.वाणी

दुनिया में लोग कहते हैं कि हमारा मन नहीं था, हमारा भाव नहीं था, हमने ऐसे ही बोल दिया। कुछ भी बोल दिया, ये बोलना है। लेकिन क्या बोलना है और कुञ् बोलना है, ये तप है। और ये तप तब आता है जब वाणी पर लगाम लगायेंगे। कैसा लगाम? वाणी भी एक कर्म है। जैसे आपने कुछ बोला, अब वो कर्म के रूप में सामने वाले के सामने आ गया। किसी से हमने उल्टी पुल्टी बात की, अब वो एक बात मुंह से निकल गई तो निकल गई। अब वो कर्म के रूप में हो गया, उसको अब दुबारा उस शेप में नहीं ला सकते। इसलिए तोल के बोलो, कम बोलो और संयमित बोलो। 

 

 



 

5. दृष्टि-बंधन

 रक्षाबंधन में हमें अपनी दृष्टि को श्रेष्ठ बनाना है। सिर्फ और सिर्फ एक दूसरे को हम अच्छी दृष्टि से मतलब आत्मिक भाव से देखेंगे और कुछ भी ऐसी जो हमारी पुरानी मान्यतायें हैं देह की कि ये स्त्री है या ये पुरुष है, इससे ऊपर उठेंगे। हमारा एक तरह से ये एक दृढ़ संकल्प है जिसे हमें कुछ दिनों तक करना है ताकि ये पक्का हो जाये।

 

 

 


 

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