राजयोग ध्यानाभ्यास 

राजयोग ध्यानाभ्यास 

 

ध्यान शब्द का प्रयोग मन की भिन्न भिन्न अवस्थाओं के लिए किया जाता है। चिंत और एकाग्रता से लेकर समर्पण और जाप त के लिए इस शब्द का प्रयोग किया जाता है। ध्यानाभ्यास का अंग्रेजी पर्याय मेडिटेशन लेट शब्द ‘मेडरी” से लिया गया है, जिसका अर्थ है- ‘स्वस्थ करना।“ ध्यानाभ्यास भावनात्मक मानसिक और शारीरिक रूप से निरोग करने की एक वैज्ञानिक एवं विश्वसनीय प्रक्रिया है। ध्यान की अवस्था जीवन की उच्चतम अवस्था है। यह आध्यात्मि जीवन के लिए इतना ही अनिवार्य है जितना शरीर के लिए श्वांस लेना। बिना ध्यान के मनुष्य प्रकाश, रंग की दुनिया में अंधे के समान हैं। 

ध्यानाभ्यास का निम्नलिखित अर्थ है
 

♦ संचेतना का प्रशिक्षण और जागरूकता का अभ्यास

♦ अपने अन्दर अन्तर्निहित सकारात्मक गुणों को पुनः खोजने, उनका आनन्द लेने और प्रयोग करने प्रक्रिया।

♦ आत्मानुभूति की विधि

♦ स्मृति, चिंतन और एकाग्रता बढ़ाने की वैज्ञानिक विधि

♦ अपने मन पर नियंत्रण करने का नियमबद्ध अभ्यास

♦ मन की गुप्त शक्तियों को जागृत करने और विचारों को दिशा देने का अभ्यास

♦ मन को सकारात्मक दिशा देने के अभ्यास की प्रक्रिया है

♦पांच इन्द्रियों के परे परमानंद का अनुभव करने के लिए समर्थ होने के अभ्यास की प्रक्रिया 

 

 

राजयोग ध्यानाभ्यास की अवस्थाएं 

जो साधक राजयोग के मार्ग पर चलकर इसके शिखर को स्पर्श करना चाहता है उसके लिए अनुभव और विवेक दो टांगें हैं। जब आत्मानुभूति होने लगती है तब अनुभवों के नए और विशाल मानसिक क्षितिज खुलने का अनुभव होता है। उच्च आध्यात्मिक अनुभव के परिणामस्वरूप आत्मा में गहन और अधिक सूक्ष्म विवेक का विकास होता है। वास्तव में, इस आध्यात्मिक अनुभव की तुलना एक समुद्र से की जा सकती है। समुद्र में गहराई में जाने पर वह और अधिक गहरा अनुभव होता है। समुद्र की गहराई असीमित प्रतीत होती है, उसी प्रकार गहन आध्यात्मिक अनुभव होने पर पूर्व हुआ अनुभव उतना ही सीमित नजर आता है। ध्यानाभ्यास में बैठने की ये अवस्थाएं और विचारों की श्रृंखला का निर्माण करना उतना अधिक महत्वपूर्ण नहीं होता है, जितना महत्व पहले वाली अवस्था का है। राजयोग का प्रारम्भिक अनुभव ही महत्वपूर्ण है क्योंकि बाद में अनुभव स्वाभाविक रूप से होते हैं। 

आरम्भिक अवस्थाः 

 राजयोग के अभ्यास का आरम्भ करने के लिए साधक को किसी विशेष शारीरिक मुद्रा में बैठने की आवश्यकता नहीं होती है। वास्तव में, राजयोग के अभ्यास में बैठने की कठिन मुद्राओं से बचना चाहिए और आसान व स्वाभाविक तरीके से बैठना चाहिए क्योंकि राजयोग का लक्ष्य भौतिक जागरूकता से परे जाना होता है। इसलिए कोई भी पीड़ा जो हमें शरीर की ओर ध्यान खींचती है, वह इसमें बाधक है। राजयोग ध्यानाभ्यास के समय आंखें बंद करने की आवश्यकता नहीं है। आँखों को बंद करने से ध्यान बड़ी तेजी से कम हो जाता है तथा शीघ्र ही मन अपने लक्ष्य और उद्देश्य से भटक जाता है। यद्यपि आरम्भ में आंखें खुली रखना कठिन लगता है परन्तु शीघ्र हो दहभाविक हो जाता है और इसके परिणामस्वरूप दैनिक कार्य करते समय मन की शक्तिशाली स्थिति होती है इस प्रकार जग का अभ्यास करते समय नेत्रों को खुला रखना आवश्यक है। 

चंचल मन पर नियंत्रण करने का प्रयास और इसे एक दिशा में लगाना आसान नहीं है परन्तु धैर्य और दृढ़ता से मन पर नियंत्रण करके इसे अपेक्षित दिशा में लगाया जा सकता है। जब आत्मा एकाग्र होने का प्रयास करती है, तब ऐसे विचार जो आध्यात्मिकता से बिल्कुल सम्बन्ध नहीं रखते, वे आत्मा को अपनी ओर खींचते हैं। ध्यान ‘याद की यात्रा के समान हैं। यह एक आध्यात्मिक यात्रा है, जिसकी मंजिल परमात्मा के साथ जीवंत और प्रेम का सम्बन्ध हैभटकता हुआ मुन कुछ आरम्भिक संघर्ष के बाद विश्राम की ओर चलने लगता है। पवित्र विचार, नकारात्मक और व्यर्थ विचारों का स्थान ले लेते है :- आवश्यकता होती है। इस आरम्भिक स्थिति में हम मन की कल्पना एक – केवल हम ‘सफाई अभियान शुरू कर रहे हैं। यह अवस्था पानी निकालने के की प्रथम अवस्था में विचार की ऊर्जा एक दिशा में चलने लगती है। 

 ध्यान की अवस्थाः 

यह राजयोग की सबसे अधिक सक्रिय और महत्वपूर्ण अवस्ट है – य ह सकारात्मक विचारों की श्रृंखला की रचना करते हैंआध्यात्मिक ज्ञान का गहन मनन-चिन्तन करने से आत्मा अपने सत्य दरूप – शत हैअंतर्ज्ञान को परमात्मा के गुणों एवं विशेषताओं से जोड़ती है। राजयोग के चमकती ज्योतिर्बिन्दु आत्मा हूँ और भ्रकुटि के मध्य में निवास करती हूँ इसन्धि नियंत्रित करने में कोई समस्या नहीं होती है। और अंत में, आत्मा एवं परमात्मा के दाट झट है। इससे शीघ्र ही सुन्दरतम् अनुभव और भावना प्रकट होती है, जिससे अत्यधिक निराश  शांतिपूर्ण, प्रसन्न, शक्तिशाली तथा सशक्त आत्माओं के रूप में परिवर्तित हो जाती हैक्षमताओं को पुनः प्रयोग करने के योग्य बन जाती है। शीघ्र ही ध्न्यास में अनुभव होने लगता है। आत्मा अपने विचारों को परमात्मा की ओर लगाने में समर्थ हो जाती है परन्तु अभी आत्मा और परमात्मा के बीच आध्यात्मिक सम्बन्ध बौद्धिक स्तर पर ही होता है। भौतिक संसार से अनास-भूर करने लायक बन जाता है परन्तु उत्कृष्ट विचारों का प्रयास करना पूर्ण रूप से नहीं होता है।

 

 

एकाग्रता की अवस्था: 

ध्यान इस तस्रो अवस्था में सांसारिक विचार बिना कठिनाई के बंद हो जाते हैं क्योंकि मन अपनी वास्तविकता के इन लेता है तथा परमात्मा का अस्तित्व और शक्तियां स्पष्ट हो जाती हैं। पवित्र चिंतन की गति धीरे-धीर क्रन्ट ले जाती है। साधक शांति के साथ अपनी ऊंच चेतना को आत्मा और परमात्मा पर स्थिर कर लेता है। 

इस स्थिति में आत्मा पवित्र अनुभवों में डूब जाती है। मैं एक पवित्र आत्मा हूँ”, यह चिन्तन पवित्रता का अनुभव कराता है। परमात्मा का एक बच्चा हूँ”, पवित्र प्रेम का अनुभव कराता है। इस अवस्था में मन में उत्पन्न होने वाले विचार अनुभव प्रदान करते हैं। आत्म और परमात्म चिन्तन करते हुए आत्मा इन अनुभवों में लीन हो जाती है, जैसे दिलो का स्वीच चालू करते ही रोशनी होती है। बहुत कम विचार अब इधर-उधर चलते हैं और परमात्मा ही चिन्तन का मुख्य केन्द्र बिन्दु बन जाता है। परमात्म-मिलन का दिव्य अनुभव होता है। 

अनुभूति की अवस्थाः 

जब हमारे विचार पूरी तरह सकारात्मक दिशा में चलते हैं, तो हम शांति और सुख की अत्यधिक अनुभूति करते हैं। मन इस अनुभव में और अधिक गहराई में डूबता जाता है तथा वह परमात्मा के जीवंत गुणों से भरपूर हो जाता है। आत्मा स्वयं को दिव्य प्रकाश के बिन्दु रूप में अनुभव करती है जो प्रेम और शक्ति से भरपूर है। इस अंतिम स्थिति में सभी प्रकार की नकारात्मकता समाप्त हो जाती है, केवल परमात्मा की आनन्द स्वरूप शांति ही रह जाती है। 

एकाग्रता, अनुभूति की अंतिम स्थिति में पहुँचा देती है, जहाँ पर पूरी तरह से परमात्म-आन्द द होता है। इस अवस्था में उच्च आध्यात्मिक संचेतना का अनुभव होता है। राजयोग की इस अवस्था में झम अँ परमात्मा के स्वरूप का प्रत्यक्ष अनुभव हो जाता है। आत्मा में परमात्मा के गुण और शक्तियों का प्रवाह कतई तथा आत्मा भी परमात्मा के समान गुण और शक्तियों से सम्पन्न बन जाती है। 

इस सर्वश्रेष्ठ संचेतना में परमात्मा के यथार्थ सत्य स्वरूप की अनुभूति होती है। देह अभिमान पूर समाप्त हो जाता है। मन के परमात्मा पर टिके होने से योग की अग्नि पूरी तरह प्रज्जवलित होती है जो आत्म पावन बना देती है और नकारात्मक संस्कारों को भस्म कर देती है। पिछले जन्मों के पाप भस्म हो जाते है 

आत्मा अपने मूल गुणों- ज्ञान, पवित्रता, शांति, शक्ति, प्रेम, प्रसन्नता और आनन्द पुनः प्राप्त कर लेती है। यह प्र इतना गहन होता है कि आत्मा में दिव्य आनन्द का सदा अनुभव होता है और योग के अभ्यास के बाद भी दे समय तक इस अलौकिक एवं दिव्य अनुभव का प्रभाव आत्मा में रहता है। 

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