योगो का राजा राजयोग

योगो का राजा राजयोग

ऊँ शान्ति

जब हम राजयोग के अर्थ पर गहनता पूर्वक विचार करते हैं तो इसके मुख्यत: दो अर्थ निकलते है आत्मा और परमात्मा का मिलनराजयोग में सभी योग समविष्ट हैं, राजयोग व्यावहारिक स्वरूप व समाज के कल्यार्णार्थ प्रस्तुत किया जा रहा है, इसका दुसरा भाव यह है कि एक निश्चित अनुशासन का पालन करके, साधना करके आत्मातत्व के वोध के अधिकारी बनना ।

निष्काम कर्म की और ज्ञानयोग से कर्मयोग की तरफ भक्तियोग की भावना ले एक परमात्मा को जानने एवं पाने की भावना ले प्रवृत्त होने को राजयोग कहते हैं ।

हमारी अणु आत्मा ,विभु आत्मा के रूप में परिवर्तित होकर उस परमपुंज परमात्मा की ओर, मिलने के लिए अग्रसर होती हैं ।

ज्ञानयोग द्वारा हमें यह ज्ञान होता हैं कि समस्त ब्रह्माण्ड पांच तत्व अग्नि, पृथ्वी, वायु, आकाश, जल से निर्मित हैं और इसके द्वारा ही प्रकृति आत्मा जिसे हम पराशक्ति कहते हैं परमात्मा जिसे अपराशक्ति कहते हैं वह इसमे समाहित भी हैं और पृथक भी ।

वास्तव में यह अपरा शक्ति सभी मूल तत्वों की जननी भी हैं राजयोग से हमें ज्ञान प्राप्त होता है कि मनुष्य मे आत्मा के अतिरिक्त बुद्धि व मन भी है बुद्धि व मन पूरी तरह एक दुसरे से संबंधित होते हैं जो एक दुसरे को चलायमान रखते हैं, इसके द्वारा हमारी पांचो इन्द्रिया नियंत्रित होती हैं, शुद्ध मन, शुद्ध बुद्धि की उपज है तथा इससे शुद्घ संस्कार उत्पन्न होते हैं और सभी इंद्रिया शुद्ध कार्य में लीन हो जाती हैं ।

 

जिससे हमारा सम्पूर्ण विकास होता हैं हमारे सभी कार्य पूरी तरह शुद्ध, गतिशील रहकर प्रकृति को प्राप्त होते हैं, और अंतत: कर्म करते हुए भी हमारे अंदर श्रेष्ठ मानवीय गुणों का विकास होता रहता हैं । और हम धीरे – धीरे उस परमात्मा की और चलायमान रहते हैं ।

प्रत्येक मनुष्य में अनंत ज्ञान व शक्ति का आवास हैं राजयोग उन्हें जाग्रत करने का मार्ग प्रशस्त करता है
मानव के चित्त को एकाग्र कर उसे समाधि नाम वाली पूर्ण एकाग्रता की अवस्था में पहुंचा देना राजयोग हैं

ऊँ शान्ति ऊँ शान्ति ऊँ शान्ति

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