7 DAYS COURSE OF BRAHMA KUMARI IN HINDI

7 DAYS COURSE OF BRAHMA KUMARI IN HINDI

7 DAYS COURSE OF BRAHMA KUMARI IN HINDI

कलयुग अभी बच्चा नहीं बल्कि बूढ़ा हो गया है

 

आपका 7 दिवसीय राजयोग कोर्स के सातवे दिन में स्वागत है।

आज का मानव कलियुग और सृष्टि के महाविनाश को लेकर चिंतित है
मगर यदि सच्चाई जाने तो दु:खी के बजाय सुखी हो जाये, यह है राजयोग मैडिटेशन का एक गुह्य रहस्य।

◻ यह खुशी की बात है सृष्टि का विनाश निकट है और शीघ्र ही सतयुग आने वाला है। आज बहुत से 👥लोग कहते हैं कि “कलियुग अभी बच्चा है, अभी तो इसके लाखों वर्ष और हैं । शास्त्रों के अनुसार अभी तो सृष्टि के महाविनाश में बहुत अधिक समय रह गया है।
परन्तु अब परमपिता परमात्मा कहते हैं कि अब तो कलियुग बूढ़ा हो चुका है। कलयुग अभी बच्चा नहीं बल्कि थोड़ा सा बचा है। अब तो सृष्टि के महाविनाश की घड़ी निकट आ पहुंची है। अब सभी देख भी रहे हैं यह सृष्टि काम, क्रोध, लोभ, मोह तथा अहंकार की चिता पर जल रही है। सृष्टि के महाविनाश के लिए एटम बम, हाइड्रोजन बम तथा मूसल(मिसाइल्स) भी बन चुके हैं। अत: अब भी यदि कोई कहता है कि महाविनाश दूर है, तो वह घोर अज्ञान में है और कुम्भकर्णी निद्रा में सोया हुआ है, वह अपना अकल्याण कर रहा है।
अब जबकि परमपिता परमात्मा शिव अवतरित होकर ज्ञान अमृत पिला रहे हैं, तो वे लोग उनसे वंचित है।



 

आज तो वैज्ञानिक विशेषज्ञ भी कहते हैं कि 👪 जनसंख्या जिस तीव्र गति से बढ़ रही है, अन्न की उपज इस अनुपात से नहीं बढ़ रही है इसलिए वे अत्यंत भयंकर अकाल के परिणाम स्वरूप महाविनाश कि घोषणा करते हैं। *पुनश्च, वातावरण प्रदूषण तथा पेट्रोल, कोयला इत्यादि शक्ति स्रोतों के कुछ वर्षो में ख़त्म हो जाने कि घोषणा भी वैज्ञानिक कर रहे हैं।* अन्य लोग पृथ्वी के ठण्डे होने के कारण हिमपात कि बात कह रहे हैं। दूसरी ओर अति गर्मी के कारण ग्लेशियर्स पिघल कर समुद्र का वाटर लेवल बड़ा रहे हैं। आज केवल रूस और अमेरिका के पास ही इतने आणविक अस्त्र 🚀 हैं, उससे अनेक बार इस धरती को खत्म किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, आज का जीवन ऐसा विकारी एवं तनावपूर्ण हो गया है कि अभी लाखों वर्ष तक कलियुग को मानना तो इन सभी बातों की ओर आंखे मूंदना ही है, परन्तु सभी को याद रहे कि परमात्मा अधर्म के महाविनाश से ही देवी देवता धर्म की पुन: स्थापना भी कराते हैं।

 

अत: सभी को मालूम होना चाहिए कि अब परमप्रिय परमपिता परमात्मा शिव सतयुगी पावन एवं दैवी सृष्टि कि पुन: स्थापना करा रहे हैं। वे मनुष्य को देवता अथवा पतितों को पावन बना रहे हैं। अब उन द्वारा सहज राजयोग तथा ज्ञान यह अनमोल विद्या सीखकर जीवन को पावन, सतोप्रधान , तथा सुख-शांति संपन्न बनाने का सर्वोत्तम पुरुषार्थ करना चाहिए।

जो  लोग यह समझ बैठे हैं,कि अभी तो कलियुग में लाखों वर्ष शेष हैं भौतिक चीज़ों में ही अपना समय व्यतीत कर रहे हैं, वे अपने ही सौभाग्य को लौटा रहे हैं।

अब कलियुगी सृष्टि अंतिम सांस ले रही है, यह मृत्यु-शैय्या पर है। यह काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार रोगों द्वारा पीड़ित है। अत: इस सृष्टि की आयु अरबो वर्ष मानना एक महान भूल है और कलियुग को बच्चा मानकर अज्ञान-निंद्रा में सोने वाले लोग ” कुम्भकरण” है। कुम्भकरण कोई सत्य में किरदार नहीं था मगर एक प्रतीक है जो मनुष्य इस ईश्वरीय सन्देश को एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देते हैं, उन्हीं के कान ऐसे कुम्भ के समान है, और वे कुम्भकरण की नींद सो रहे हैं क्योंकि कुम्भ बुद्धिहीन होता है

” क्या रावण के दस सिर थे, रावण किसका प्रतीक है ?

❋ भारत के लोग प्रतिवर्ष रावण का बुत जलाते हैं। उनका काफी विश्वास है की एक दस सिर वाला रावण श्रीलंका का 👑 राजा था, वह एक बहुत बड़ा राक्षस था और उसने श्री सीता का अपहरण किया था। वे यह भी मानते हैं की रावण बहुत बड़ा विद्वान था इसलिए वे उसके हाथ में वेद, शास्त्र इत्यादि दिखाते हैं। साथ ही वे उसके शीश पर गधे का सिर भी दिखाते हैं। जिसका अर्थ वे यह लेते हैं की वह हठी और मतिहीन था लेकिन अब परमपिता परमात्मा शिव ने समझाया है कि रावण कोई दस शीश वाला राक्षस (मनुष्य) नहीं था, बल्कि रावण का पुतला वास्तव में बुराई का प्रतीक है। रावण के दस सिर पुरुष और स्त्री के पांच-पांच विकारों को प्रकट करते हैं और उसकी तुलना एक ऐसे समाज का प्रतिरूप है। जो इस प्रकार के विकारी स्त्री-पुरुष का बना हो इस समाज के 👥 लोग बहुत ग्रन्थ और शास्त्र पढ़े हुए तथा विज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त भी हो सकते हैं लेकिन वे हिंसा और अन्य विकारों के वशीभूत होते हैं। इस तरह उनकी विद्वता उन पर बोझ मात्र होती है। वे उद्दंड बन गए होते हैं और भलाई की बातों के लिए उनके कान बंद हो गए होते हैं।
“रावण” शब्द का अर्थ ही है – जो दूसरों को रुलाने वाला है। अत: यह बुरे कर्मों का प्रतीक है, क्योंकि बुरे कर्म ही तो मनुष्य के जीवन में दुःख व आंसू लाते हैं।
सीता के अपहरण का भाव वास्तव में आत्माओं की शुद्ध भावनाओं के ही अपहरण का सूचक है। वास्तव में रावण, विकारों का, सीता, हम आत्माओं की,राम, निराकार शिव के प्रतीक हैं,जो आत्माएं आज राजयोग की शिक्षा से दैवीय गुण धारण कर और आत्मा रूपी सीताओं को विकारों रूपी रावण से छुड़ाने में राम अर्थात् शिव के कार्य में सहयोग कर रही, वही राम की सेना है।
इसी प्रकार कुम्भकरण आलस्य का तथा “मेघनाथ” कटु वचनों का प्रतीक है और यह सारा संसार ही एक महाद्वीप है अथवा मनुष्य का मन ही लंका है।




 

इस विचार से हम कह सकते हैं की इस विश्व में द्वापरयुग और कलियुग में (अर्थात 2500 वर्ष) “रावण राज्य” होता है,क्योंकि इन दो युगों में लोग माया या विकारों के वशीभूत होते हैं। *इस समय अनेक पूजा पाठ करने तथा 📖 शास्त्र पढ़ने के बाद भी मनुष्य विकारी, अधर्मी बन जाते हैं रोग, शोक, अशांति और दुःख का सर्वत्र बोल बाला होता है। मनुष्यों का खानपान असुरों जैसा (मांस, मदिरा, तामसी भोजन आदि) बन जाता है वे काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष नफरत आदि विकारों के वशीभूत होकर एक दूसरे को दुःख देते और रुलाते रहते हैं। ठीक इसके विपरीत स्वर्ण युग (सतयुग) और रजत युग(त्रेतायुग) में राम-राज्य था, क्योंकि परमपिता, जिन्हें रमणीक अथवा सुखदाता होने के कारण “राम” भी कहते हैं, उसने पवित्रता, शांति और सुख संपन्न देश स्वराज्य की पुन: स्थापना की थी उस राम राज्य के बारे में प्रसिद्द है कि तब शहद और दूध की नदियां बहती थी। शेर तथा बकरी एक ही घाट पर पानी पीते थे।

अब वर्तमान में मनुष्यात्माएं फिर से माया अर्थात रावण के प्रभाव में है,औद्योगिक उन्नति, प्रचुर धन-धान्य और सांसारिक सुख – सभी साधन होते हुए भी मनुष्य को सच्चे सुख शांति की प्राप्ति नहीं है। घर-घर में कलह- क्लेश लड़ाई-झगड़ा और दुःख अशांति है तथा मिलावट, अधर्म और असत्यता , भ्रष्टाचार , अनैतिकता का ही राज्य है तभी तो इसे “रावण राज्य” कहते हैं।

अब परमात्मा शिव गीता में दिए अपने वचन के अनुसार धरा पर अवतरित हो सहज ज्ञान और राजयोग की शिक्षा दे रहे हैं और मनुष्यात्माओं के मनोविकारों को ख़त्म करके उनमें दैवी गुण धारण करा रहे हैं (वे पुन: विश्व में बापू-गाँधी के स्वप्नों के राम राज्य की स्थापना करा रहे हैं।) अत: हम सबको सत्य धर्म और निर्विकारी, अहिंसक मार्ग अपनाते हुए परमात्मा के इस महान कार्य में सहयोगी बनना चाहिए।

“जीवन  कमल पुष्प समान कैसे बनायें ?”

स्नेह और सौहार्द्र के प्रभाव के कारण आज मनुष्य को घर में घर-जैसा अनुभव नहीं होता I एक मामूली कारण से घर का पूरा वातावरण बिगड़ जाता है I अब मनुष्य की वफ़ादारी और विश्वास्पात्रता भी टिकाऊ और दृढ़ नहीं रहेI नैतिक मूल्य अपने स्तर से काफी गिर गए हैं I कार्यालय हो या व्यवसाय, घर हो या रसोई, अब हर जगह परस्पर संबंधो को सुधारने, स्वयं को उस अनुरूप ढालने और मिलजुल कर चलने की जरुरत है I अपनी स्थिति को निर्दोष एवं संतुलित बनाये रखने के लिए हर मानव को आज बहुत मनोबल इकट्ठा करने की आवश्यकता है I इसके लिए योग बहुत ही सहायक हो सकता है I

जो ब्रह्माकुमार/कुमारी हैं, वे दूसरों को भी शांति का मार्ग दर्शाना एक सेवा अथवा अपना कर्तव्य समझते हैं I ब्रह्माकुमार/कुमारी जन-जन को यह ज्ञान दे रहे हैं कि *”सुख और “शांति पवित्र जीवन का एक फल है”* और पवित्रता एवं शांति के लिए परमपिता परमात्मा का परिचय तथा उनके साथ मान का नाता जोड़ना जरुरी है I अत: वह उन्हें राजयोग-केंद्र 🏦अथवा ईश्वरीय मनन चिंतन केंद्र पर पधारने के लिए आमंत्रित करते हैं, जहाँ उन्हें यह आवश्यक ज्ञान दिया जाता है कि राजयोग का अभ्यास कैसे करें और जीवन को 🌷कमल पुष्प के समान कैसे बनाये इस ज्ञान और योग को समझने का फल यह होता है कि कोई कार्यालय में काम कर रहा हो या रसोई में कार्यरत हो तो भी मनुष्य शांति के सागर परमात्मा के साथ स्वयं का सम्बन्ध स्थापित कर सकता है I इस सब का श्रेष्ठ परिणाम यह होता है कि सारा परिवार प्यार और शांति के सूत्र में पिरो जाता है,और वे सभी वातावरण में आनन्द में एवं शांति का अनुभव करते हैं और अब वह परिवार एक सुव्यवस्थित एवं संगठित परिवार बन जाता है I दिव्य ज्ञान के द्वारा मनुष्य विकार तो छोड़ देता है और गुण धारण कर लेता है I इसके लिए, जिस मनोबल की जरुरत होती है, वह मनुष्य को राजयोग से मिलता है I इस प्रकार मनुष्य अपने जीवन को कमल पुष्प के समान बनाने के योग्य हो जाता है I



कमल की यह विशेषता है कि वह जल में रहते हुए जल से न्यारा होकर रहता है I हालाँकि कमल के अन्य सम्बन्धी, जैसे कि कमल ककड़ी, कमल डोडा इत्यादि है, परन्तु फिर भी कमल उन सभी से ऊपर उठकर रहता है I इसी प्रकार 👬हमें भी अपने परिवार, सम्बंधियों एवं मित्रजनों के बीच रहते हुए उनसे भी न्यारा, अर्थात मोहजीत होकर रहना चाहिए I कुछ लोग कहते हैं कि गृहस्थ में ऐसा होना असम्भव है I परन्तु हमने स्वयं को कभी मोह से रहित होकर रहने का कभी ख्याल ही नहीं किया इसलिए असंभव प्रतीक होता है। हम ऐसा मानते हैं कि अगर मोह नहीं तो प्यार नहीं। परन्तु ऐसा नहीं है। मोह हमें दुःख भी देता है और मोह होने से प्यार भी स्वार्थ वाला प्यार हो जाता है और वहीं मोहरहित प्यार में निस्वार्थ प्रेम और सेवा समाई होती है। मोह वश प्यार में स्वयं और अपनों को दुःख पहुँचता है और वहीं मोहरहित प्यार में स्वयं और अपनों को सुख पहुँचता है।

हमें चाहिए कि हम सभी को परमपिता परमात्मा के बच्चे मानकर न्यासी ( ट्रस्टी ) होकर उनसे व्यवहार करें I एक न्यायाधीश भी ख़ुशी या गमी के निर्णय सुनाता है, परन्तु वह स्वयं उनके प्रभावाधीन नहीं होता I ऐसे ही हम भी सुख-दुःख कि परिस्थितियों में साक्षी होकर रहे, इसी के लिए हमें सहज राजयोग सीखने कि आवश्यकता है I

मनुष्य जीवन का लक्ष्य क्या है?

मनुष्य का वर्तमान जीवन बड़ा अनमोल है क्योंकि अब संगमयुग में ही वह सर्वोत्तम पुरुषार्थ करके जन्म-जन्मान्तर के लिए सर्वोत्तम प्रारब्ध बना सकता है और अतुल 💎हीरे-तुल्य कमाई कर सकता है।

वह इसी जन्म में सृष्टि का मालिक अथवा जगतजीत बनने का पुरुषार्थ कर सकता है। परन्तु आज मनुष्य को जीवन का लक्ष्य मालूम न होने के कारण वह सर्वोत्तम पुरुषार्थ करने की बजाय इसे विषय-विकारो में गँवा रहा है। अथवा अल्पकाल की प्राप्ति में लगा रहा है। आज वह लौकिक शिक्षा द्वारा वकील, डाक्टर, इंजिनीयर बनने का पुरुषार्थ कर रहा है और कोई तो राजनीति में भाग लेकर देश का नेता, मंत्री अथवा प्रधानमंत्री बनने के प्रयत्न में लगा हुआ है अन्य कोई इन सभी का सन्यास करके, “सन्यासी” बनकर रहना चाहता है। परन्तु सभी जानते है की मृत्यु-लोक में तो राजा-रानी, नेता वकील, इंजीनियर, डाक्टर, सन्यासी इत्यादि कोई भी पूर्ण सुखी नहीं है। सभी को तन का रोग, मन की अशांति, धन की कमी, प्रकृति के द्वारा कोई पीड़ा, कुछ न कुछ तो दुःख लगा ही हुआ है। अत: इनकी प्राप्ति से मनुष्य जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती,क्योंकि मनुष्य तो सम्पूर्ण – पवित्रता, सदा सुख और स्थाई शांति चाहता है।

 

 

चित्र में अंकित किया गया है कि 👥 मनुष्य जीवन का लक्ष्य जीवन-मुक्ति की प्राप्ति अर्थात वैकुण्ठ में सम्पूर्ण सुख-शांति-संपन्न श्री नारायण वा श्री लक्ष्मी पद की प्राप्ति ही है। क्योंकि वैकुण्ठ के देवता तो अमर माने गए है, उनकी अकाले मृत्यु नहीं होती; उनकी काया सदा निरोगी रहती है। और उनके खजाने में किसी भी प्रकार की कमी नहीं होती इसीलिए तो मनुष्य स्वर्ग अथवा वैकुण्ठ को याद करते हैं और जब उनका कोई प्रिय 👫सम्बन्धी शरीर छोड़ता है तो वह कहते हैं कि -” वह स्वर्ग सिधार गया है।”  इस पद की प्राप्ति स्वयं परमात्मा ही ईश्वरीय विद्या द्वारा कराते है।

इस लक्ष्य की प्राप्ति कोई मनुष्य अर्थात कोई साधू-सन्यासी, गुरु या जगतगुरु नहीं करा सकता, बल्कि यह 👑👑दो ताजो वाला देव-पद अथवा राजा-रानी पद तो ज्ञान के सागर परमपिता परमात्मा शिव ही से प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा ईश्वरीय ज्ञान तथा सहज राजयोग के अभ्यास से प्राप्त होता है।

अत: जबकि परमपिता परमात्मा शिव ने इस सर्वोत्तम ईश्वरीय विद्या की शिक्षा देने के लिए प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व-विद्यालय की स्थापना की है। तो सभी नर-नारियों को चाहिए की अपने घर-गृहस्थ में रहते हुए, अपना कार्य धंधा करते हुए, प्रतिदिन एक-दो- घंटे निकालकर अपने भावी जन्म-जन्मान्तर के कल्याण के लिए इस सर्वोत्तम तथा सहज शिक्षा को प्राप्त करें।

इस विद्या की प्राप्ति के लिए कुछ भी खर्च करने की आवश्यकता नहीं है, इसीलिए इसे तो निर्धन 👤 व्यक्ति भी प्राप्त कर अपना सौभाग्य बना सकते हैं। इस विद्या को तो कन्याओं, माताओं, वृद्ध-पुरुषों, छोटे बच्चों और अन्य सभी को प्राप्त करने का अधिकार है क्योंकि आत्मा की दृष्टी से तो सभी परमपिता परमात्मा की संतान हैं।

“अभी नहीं तो कभी नहीं”

वर्तमान जन्म सभी का अंतिम जन्म है। इसलिय अब यह पुरुषार्थ न किया तो फिर यह कभी न हो सकेगा। क्योंकि स्वयं ज्ञान सागर परमात्मा द्वारा दिया हुआ यह मूल गीता – ज्ञान कल्प में एक ही बार इस कल्याणकारी संगम युग में ही प्राप्त हो सकता है।

ओम् शान्ति



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