rakhi 2019, raksha bandhan rakhi muhurat

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भारत में जितने भी त्योहार मनाए जाते हैं उन सबमें से रक्षा-बन्धन अधिक सात्विक मालूम होता है । परन्तु जिस अर्थ को लेकर यह त्योहार शुरू हुआ था, आज उसमें काफ़ी अन्तर आ गया है। आज जो रक्षा-बन्धन का त्योहार मनाया जाता है उसमें प्राय: बहनें, भाई को राखी बाँधती हैं। लोग इसका यह अभिप्राय समझते हैं कि इस रस्म के बाद भाई अपनी बहन की रक्षा करने के लिए बाध्य हो जाता है। परन्तु अब हम इस बात पर विचार करेंगे कि क्या रक्षा-बन्धन का आदि स्वरूप और वास्त विक अभिप्राय यही था और क्या रक्षा-बन्धन का यह रहस्य मानना विवेक-सम्मत है?

 क्या रक्षा-बन्धन शारीरिक रक्षा के लिए है? 

सोचने की बात है कि यदि शारीरिक रक्षा ही रक्षा बन्धन का अभिप्राय होता तो कन्याएं अपने छोटे-छोटे, अबोध भाइयों को राखी क्यों बाँधतीं? आज हम देखते हैं कि चौदह वर्ष की कन्या अपने तीन वर्ष की आयु वाले भाई को भी राखी बाँधती है; क्या तीन वर्षीय बालक रक्षा करने में समर्थ है? पुनश्च, चार वर्ष की आयु वाली छोटी बहन अपने दो वर्षीय भाई को भी राखी बाँधती है यद्यपि दोनों को इस रस्म के रहस्य का पता ही नहीं होता। न तो वे अभी रक्षा करने में समर्थ होते हैं, न वे इस प्रतिज्ञा को समझते हैं। फिर, यह भी प्रश्न उठता है कि यदि शारीरिक रक्षा ही अभिप्राय होता तो कन्या भाई को रक्षा-बन्धन – की बजाय अपने पिता को, चाचे को या मामे को ही राखी क्यों न बाँधती? भाई में ऐसी क्या विशेषता है जो कि पिता में, मामे में या चाचे में नहीं है? 

 

 

 



 

इसके अतिरिक्त, यह भी विचारणीय है कि पूर्व काल में शैतान लोगों अथवा अत्याचारियों से नागरिकों की रक्षा करना तो राजा का कर्त्तव्य हुआ करता था। उस काल में तो लोगों के जान-माल की रक्षा के लिए राज्य की ओर से ठीक व्यवस्था होती थी, राजा पूरा न्याय करता था और अपराधियों तथा अत्याचारियों को कड़ा दण्ड देता था जिसके परिणामस्वरूप उन दिनों अपराध बहुत कम होते थे, तब तो फिर मानना पड़ेगा कि ‘रक्षा बन्धन’ का त्योहार भाई द्वारा बहन की शारीरिक रक्षा के लिए नहीं था बल्कि इसके पीछे कोई और रहस्य था। बहन और भाई में तो स्नेह स्वाभाविक है, तब फिर भाई द्वारा बहन की रक्षा में सन्देह क्यों? फिर कन्या-माता की रक्षा तो केवल सगे भाई को ही नहीं बल्कि हरेक ‘भाई’ का कर्तव्य है, तब फिर सगे भाई को यह कर्त्तव्य जतलाने की क्या ज़रूरत थी? सहोदर होने के कारण तथा स्नेह-वश भी हरेक भाई स्वाभाविक तौर पर यह कर्तव्य निभाता ही है और जो निभाना ही न चाहे या जिसका स्नेह ही न हो, वह तो राखी बाँधने पर भी रक्षा नहीं करेगा। श्रीमद्भागवत् में जिस कंस का वर्णन है, उसने तो अपनी बहन देवकी को मारने के लिए तलवार निकाल ली थी। तो स्पष्ट है कि अगर दृष्टि-वृत्ति बदल जाये तो भाई भी कसाई हो जाता है और दृष्टि-वृत्ति ठीक रहे तो कसाई भी भाई बन सकता है। ‘यम’ के बारे में लोग कहते हैं कि वह सबको दण्ड अथवा ताड़ना देता है। अत: मानव मात्र के लिए वह भयानक है परन्त अपनी बहन यमुना’ का तो भाई ही है। अत: जबकि भाई अपनी बहन की रक्षा के लिए वैसे भी स्नेह तथा सम्बन्ध के कारण बाध्य है, तो रक्षा-बन्धन को शारीरिक रक्षा के लिए एक रस्म मानना विवेक-सम्मत नहीं प्रतीत होता। 

‘रक्षा-बन्धन’ का वास्तविक अभिप्राय 

‘रक्षा-बन्धन’ त्योहार के जो अन्य नाम हैं, उनसे रक्षा-बन्धन का वास्तविक अभिप्राय स्पष्ट हो जाता है। उदाहरण के तौर पर इस त्योहार को ‘पुण्य प्रदायक पर्व’ अथवा विष तोड़क पर्व’ भी कहा जाता है। इससे सिद्ध है कि इसका सम्बन्ध विषय-विकारों को छोड़ने तथा पवित्र आत्मा या पुण्यात्मा बनने से है। इस त्योहार का यह अभि प्राय हम इसलिए भी सही मानते हैं क्योंकि रक्षा-बन्धन बहनों के अतिरिक्त ब्राह्मण भी अपने यजमानों को बाँधते हैं। ब्राह्मण लोग धर्म के कार्यों में ही हाथ डालते हैं और पवित्र कार्य करना ही उनके लिए नियम है। वे उस दिन केवल राखी नहीं बाँधते बल्कि मस्तक पर तिलक भी देते हैं। बहनें भी अपने भाइयों को मस्तक पर चन्दन अथवा केसर का तिलक देती हैं और भृकुटि में यह तिलक आत्मा को ज्ञान के रंग में रंगने अथवा आत्मिक स्मृति में रहने का प्रतीक है। तो स्पष्ट है कि रक्षा-बन्धन भी पवित्रता रूपी धर्म में स्थित होने की प्रतिज्ञा करने अथवा ‘काम’ (वासना) रूपी विष को तोड़ने (छोड़ने) का प्रतीक है। 

रक्षा-बन्धन पवित्रता का प्रतीक है

रक्षा-बन्धन का हमने ऊपर की पंक्तियों में जो भाव बताया है, उसे समझने से ही इसका महत्त्व मालूम हो सकता है। यों तो रक्षा-बन्धन रेशम या नायलान के धागों से बना हुआ या सूत के धागों से मौलि के रूप में बना हुआ होता है और कुछ रुपये ही उसका मूल्य होता है परन्तु वास्तव में उसका माहात्म्य तो बहत बडा बताया गया है। अवश्य ही वह किसी उच्च भाव का प्रतीक होगा। 

 

आज की परिस्थिति में रक्षा-बन्धन

समय बदलने के साथ-साथ यह त्योहार पवित्रता अथवा धर्म की रक्षा की बजाय ‘शारीरिक रक्षा’ के लिए मनाया जाने लगा। फिर जब देश पर विधर्मियों तथा विदे शियों ने आक्रमण किये तब वीरांगनायें अपने-अपने पति को देश की रक्षार्थ रण-भूमि में भेजते समय भी उन्हें बाँधने लगी ताकि वह दृढ़ प्रतिज्ञ होकर संग्राम में कूद पड़ें, वह पत्नी के प्यार तथा सन्तति के मोह में वहाँ से वापस न भाग आये। ललनाओं द्वारा इस प्रकार राखी बाँधे जाने से उन वीरों को युद्ध के लिए बहुत प्रेरणा मिलती थी। परन्तु आज की परिस्थिति बहुत भिन्न है। आज तो मानव काम, क्रोधादि शत्रुओं से बुरी तरह पीड़ित और आहत है। अत: अब परमपिता परमात्मा, जो ही मनुष्य के कल्याणकारी और रक्षक हैं, सभी नर-नारियों को आदिम और वास्तविक रहस्य से राखी बाँधते हैं। वे कहते हैं कि अब विश्व के लिए संकट का समय (Emergency) है। एटम और हाइड्रोजन बमों द्वारा विश्व पर मुसीबत बन आई है और विकारों की सूक्ष्माग्नि से दुनिया झुलस रही है। अत: अब इस सृष्टि को इन विकारों रूपी महाशत्रुओं से बचाना है और यहाँ स्वर्ग का राज्य-भाग्य स्थापित करना है। अत: अब आप पवित्र बनो और उस पवित्रता के व्रत या प्रतिज्ञा की प्रतीक राखी को बाँध कर परस्पर भाई-बहन या भाई-भाई की शुद्ध दृष्टि और वृत्ति को धारण करो। आज फिर ऐसा ही रक्षा बन्धन बाँधने की ज़रूरत है। 

 

रक्षाबंधन शुभ मुहूर्त

 

ज्योतिषियों के अनुसार इस बार रक्षाबंधन पर भद्रा नहीं है। इसलिए पूरा दिन राखी बांधने के लिए शुभ रहेगा। कई ऐसे संयोग बनेंगे, जिससे इस पर्व का महत्व और बढ़ जाएगा। चार दिन पहले 11 अगस्त को गुरु मार्गी होकर सीधी चाल चलेंगे। रक्षाबंधन पर लगभग 13 घंटे तक शुभ मुर्हूत रहेगा। जबकि दोपहर 1:43 से 4:20 तक राखी बांधने का विशेष फल मिलेगा

 




 



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