WHO IS GOD-BRAHMA KUMARI SEVEN DAYS COURSE PART TWO

RAJYOGA SEVEN DAYS COURSE PART TWO

WHO IS GOD-BRAHMA KUMARI SEVEN DAYS COURSE PART TWO

आप सभी का 7 दिवसीय  राजयोग कोर्स के दूसरे दिन में स्वागत है।

परमात्मा का परिचय

 

 



प्राय: सभी मनुष्य परमात्मा को ‘हे पिता’, ‘हे दु:खहर्ता और सुखकर्ता प्रभु’, (O Heavenly God☝Father) इत्यादि सम्बन्ध-सूचक शब्दों से याद करते हैं। परन्तु यह कितने आश्चर्य की बात है कि जिसे वे ‘पिता’ कहकर पुकारते हैं।उसका सत्य और स्पष्ट परिचय उन्हें नहीं है । परिचय और स्नेह -सम्बन्ध न होने के कारण परमात्मा को याद करते समय भी उनका मन एक ठिकाने पर नहीं टिकता। इसलिए उन्हें परमपिता परमात्मा🌟से शान्ति तथा सुख का जो जन्म-सिद्ध अधिकार प्राप्त होना चाहिए वह प्राप्त नहीं हो पाता है।

आज दुनिया में सभी धर्म वाले भगवान को अपनी-अपनी रीति से मानत हैं, याद करते हैं।

परमात्मा के बारे में अनेक मत मतान्तर हैं जैसे :-

 

 

 

 

आत्मा ही परमात्मा है।
▪ भगवान सबके अंदर है।।
▪ देवी- देवतायें भगवान के ही रूप हैं। हनुमान भगवान है, राम भगवान है,श्री कृष्ण भगवान है। फिर हम कहते ईश्वर या भगवान एक है।
▪ कई कहते परमात्मा नाम रूप से न्यारा है।अब नाम रूप से न्यारा है तो हम इतनी पूजा भक्ति करते ……कहते अंखियाँ हरी दर्शन की प्यासी ।
फिर भगवान का नाम रूप नहीं तो दर्शन किसका होगा।
तो भगवान ना ही नाम रूप से न्यारा है ना ही कोई शरीरधारी है तो भगवान क्या है।
▪ अब सत्य क्या है। क्या ये सब भगवान हैं या भगवान कोई और है। आइये आज हम आपको परमात्मा भगवान के बारे में बताते हैं ।

▪ आपने भी परमात्मा को याद किया होगा, और आपके मन में प्रश्न होगा कि असल में परमात्मा कौन है, क्या है, उनका रूप क्या है, कहाँ रहते हैं ❓❓

आज हम आपके सभी प्रश्नों का उत्तर दे आपको परमात्मा का सही परिचय देंगे।

परमात्मा ☝के परिचय में निम्न 5 बातें जानना बहुत जरुरी है।

१. परमात्मा का स्वरुप
२. परमात्मा का नाम
३. परमात्मा के गुण
४. परमात्मा का निवास स्थान
५. परमात्मा के कर्तव्य

 

 



१. परमात्मा का स्वरुप :-

जैसे मनुष्य का पिता मनुष्य है उसी प्रकार किसी पशु को ले लें तो पशु का पिता कैसा होगा जैसा वो वैसा उसका बच्चा होगा ।

ऐसे ही  मैं आत्मा हूँ, वो परमात्मा है, तो आत्माओं के परमपिता परमात्मा🌟भी एक आत्मा है।

जैसा स्वरूप आत्मा का है वैसा ही उसके पिता परमात्मा का स्वरूप भी है।

आत्मा का स्वरूप क्या है ❓❓
ज्योतिबिंदु रूप। तो परमात्मा का स्वरूप भी आत्माओं की तरह ज्योतिबिंदु रूप है।

▪ परमात्मा में दो शब्द हैं परम और आत्मा। उन्हें परम कहते हैं क्योंकि सबसे परम है, एक ही है , ऊँच है।
उन्हें ही गॉड ☝भगवान कहते हैं।

▪ परमात्मा का अर्थ आकार से नहीं लेकिन परम का अर्थ ,सर्वश्रेष्ठ है।

▪ भारत में परमात्मा की पूजा ज्योतिर्लिंगम के रूप में करते हैं लिंग अर्थात आकृति चिन्ह ज्योतिर्लिंगम् का अर्थ है जिसका आकार ज्योति स्वरूप🔥है। ज्योति स्वरूप होने के कारण  ही परमात्मा को निराकार कहा गया है।

▪ निराकार💧का अर्थ शाब्दिक नहीं है शाब्दिक अर्थ लिया जाए तो उसका यह अर्थ निकलेगा की उनका कोई आकार नहीं है, परंतु ऐसा नहीं है परमात्मा का यह रुप का एक अर्थ है उन्हें अपना शरीर नहीं है इसलिए उन्हें अशरीरी कहा जाता है। निराकार शब्द साकार की तुलना में प्रयुक्त हुआ है अर्थात मनुष्य जैसा आकारी शरीर परमात्मा धारण नहीं करते हैं इसलिए उनको निराकार कहते हैं।

▪ निराकार ज्योतिबिंदु रूप और बिंदु का कोई माप थोड़े ही होता है, बिंदु ना तो आयताकार है ना वर्गाकार है ना वृत्ताकार है और ना ही उसका अन्य कोई आकार है बल्कि रेखागणित के अनुसार भी निराकार ज्योति बिंदु रूप कहना ही ठीक है।

▪ परमात्मा का यह रूप अपरिवर्तनीय है और सूक्ष्म अति सूक्ष्म होने के कारण अविनाशी भी है और अविभाज्य भी है।

▪ परमात्मा का कौनसा स्वरुप है जिसे सभी धर्म की आत्माएं स्वीकार करती हैं?⤵

▪ अब देखिए ज्योति की पूजा कोई कैसे करें, तो मानव ने पूजा करने के लिए और अपनी श्रद्धा को व्यक्त करने के लिए इसे एक आकार दे  दिया इसलिए ज्योति स्वरुप परमात्मा का यादगार ज्योतिर्लिंगम🔥है इसको ही बाद में हिन्दू धर्म में शिवलिंग कहा गया।

▪ इस्लाम धर्म में मूर्ति पूजा नहीं होती है,वो किसी देहधारी 👫को परमात्मा नहीं मानते हैं और जब हज की यात्रा पर मक्का जाते हैं तो बाहर एक गोल पत्थर है जिसे *संग-ए-असवद* कहते हैं उसे चूम कर ही अंदर जाते हैं और बाद में अंदर जा कर कहते हैं “हे परवरदिगार ‘हे नूरे , इलाही मेरी हज कबूल करो।”
‘नूरे इलाही’ मतलब परमात्मा को लाइट या प्रकाश के रूप में याद किया।

▪  क्राइस्ट ने भी God को light कहा है उन्होंने कहा है कि गॉड इज लाइट, आई एम सन आफ गॉड।

▪ सिख धर्म में भी किसी भी देहधारी👴को परमात्मा नहीं कहा है उन्होंने कहा “नानक एको सिमरिए जो जल थल रहे समाय दूजा कोई ना पूजिए जो जन्मे ते मर जाए” अर्थात जिसने जन्म लिया है उसकी मृत्यु होगी वह परमात्मा नहीं है, उसे पूजने का भी कोई लाभ नहीं । याद करना है, पूजना है तो उस निराकार परमात्मा ज्योति बिंदु रूप को ही याद करो।

▪ बौद्ध धर्म में महात्मा बुद्ध ने भी कभी मूर्ति पूजा के लिए किसी को प्रेरित नहीं किया। वह स्वयं ध्यान मुद्रा में हैं तो किसका ध्यान कर रहे हैं। किसकी तपस्या कर रहे हैं। आज भी जापान चले जाएं तो वहाँ शिन्टाईज़म संप्रदाय वाले 3 फुट की ऊंचाई पर स्थापित किया हुआ और 3 फुट दूर एक थाली के अंदर लाल पत्थर रखते हैं इसे कहते हैं “काबा का पवित्र पत्थर ” बिल्कुल निराकार ज्योतिर्लिंग आकार का है और उसको उन्होंने कहा “चिनकुनशेकी” चिनकुनशेकी अर्थात ‘जो शांति का दाता है ‘। जिसका ध्यान करने से हमें शांति मिलती है इसलिए वह उसके सामने बैठकर ध्यान करते हैं।

▪ पारसी लोग जब ईरान से भारत आए थे तो जलती हुई ज्योति🔥को साथ ले आए थे और उनके मंदिर को “अग्यारी” कहा जाता है जहाँ यह अखंड ज्योत जलती रहती है और आज भी जब उनकी कोई नई अग्यारी स्थापित होती है तो जलती हुई ज्योत का एक टुकड़ा ले जाकर वहां स्थापित करते इसलिए उनकी अग्यारी को ‘फायर टेंपल’ कहते हैं।

◆ सार :- तो इससे हमे पता चला की सभी धर्मों की मनुष्यात्माओं ने परमात्मा को ज्योतिबिंदु रूप ही माना

◆ हिन्दू लोग कहते हैं ‘जोतिर्लिंगम’

◆ मुस्लिम लोग कहते हैं नूरे इलाही अर्थात अल्लाह नूर है ।

◆ क्रिश्चियन लोग कहते हैं , God is point of light .

◆ सिख धर्म में भी मानते हैं कि परमात्मा परमज्योति स्वरुप, स्वप्रकाश स्वरुप, ओंकार, आदि कहा गया।

२. परमात्मा का नाम :-

🌸 अब अगर रूप है तो नाम भी होगा नहीं तो हम उसको याद कैसे करेंगे।

🌸 जैसे आत्मा को संबोधित करने के लिए भी तो एक नाम है, तो परमात्मा जब स्वयं आकर अपना परिचय देते हैं तो वो अपना नाम भी बताते हैं।

🌸 परमात्मा का जो नाम है वो उनके गुणों के आधार से है और जो स्वरूप है उस आधार से उनका नाम है।

🌸 हम आत्माओं के नाम तो हमारे माता-पिता ने रखा है परंतु परमात्मा का स्वयं घोषित किया हुआ नाम है “शिव”।

शिव क्यों क्योंकि –
      🌸 शिव का अर्थ है बीज (सीड ऑफ नॉलेज) उसके अंदर सारी सृष्टि की नॉलेज है।
      🌸 शिव अर्थात ‘कल्याणकारी’
      🌸 सदाशिव अर्थात ‘सदा कल्याणकारी’ वह कभी किसी का अकल्याण नहीं कर सकता है ।

🌸 जब हम शिव कहते हैं तो इसको किसी धर्म के साथ ना जोड़ा जाए क्योंकि हिंदू धर्म में हम जैसे शिव-शंकर मानकर याद करते हैं लेकिन जब हम शिव कहते हैं तो शिव उस परमात्मा ज्योतिस्वरूप का खुद घोषित किया नाम है। इसलिए हम शंकर जी की जो मूर्ति है उसके साथ उसको नहीं जोड़े ,शंकर जी देवता हैं।

🌸 शिव अर्थात ज्योति स्वरूप और क्योंकि वह मेरे पिता हैं तो उनको हम शिवबाबा कहकर याद करते हैं। तो बाबा कोई देहधारी नहीं बल्कि निराकार💧ज्योति स्वरुप परमात्मा शिवबाबा है।

शिव ही परमात्मा हैं उनको  “5 “बातों की कसौटी से परखा जा सकता है।

१.सर्वधर्ममान्य अर्थात जिसे हर धर्म वाले ईश्वर के रूप में स्वीकार करें।
 🌸 हर धर्म में ज्योति स्वरूप “शिव” का स्थान पहला है…श्रीराम ने पूजा की वो भी शिव की, श्रीकृष्ण ने भी शिव की पूजा की,गुरुनानक जी ने ओंकार की महिमा की, जिसे हिन्दू धर्म में शिव आरती में गाते हैं “जय शिव ओमकारा”,मुस्लिम भाई संग -ए- असवद जो शिव की प्रतिमा के आकार का है वहां सर झुकाते हैं।     
     
२.सर्वोच्च अर्थात जिसके ऊपर और कोई शक्ति न हो,जिसका कोई माता -पिता ,गुरु-शिक्षक आदि न हो।
 🌸 इसलिए शिव के साथ एक शब्द जुड़ता है- शिव शम्भू । शम्भू अर्थात स्वयंभू।स्वयंभू का अर्थ है जो स्वयं प्रकट हुआ है ,उनको उत्पन्न करने वाला कोई माता- पिता ,गुरु -शिक्षक आदि नहीं हैं।
                     
३.सर्वोपरि अर्थात जो सभी चक्रों से ऊपर है। जन्म-मृत्यु ,सुख-दु:ख, पाप-पुण्य सभी चक्रों से परे हैं । जो अजन्में हैं ,कालों के काल महाकाल हैं, देवो के देव महादेव शिव हैं ।

४. सर्वशक्तिमान अर्थात जो सभी देवी देवताओं ,धर्म पिताओं ,सभी भौतिक-अभौतिक शक्तिओं , प्रकृति के तत्वों आदि सभी से शक्तिशाली, सर्व आध्यात्मिक शक्तियों से भरपूर जिससे सभी प्राप्त करते हैं, परमात्मा किसी से प्राप्त नहीं करते हैं।

🌸 रेखागणित वा ज्योमेट्री (Geometry) के अंतर्गत जब एक बिंदु लगाया जाता है तो उस बिंदु की व्याख्या है -अनन्त (infinite)।

🌸 विज्ञान 🚀में सबसे सूक्ष्म अणु को माना जाता है और जितनी बार एटम को फ्यूज (fuse)करो उतनी बार वह अधिक शक्तिशाली हो जाता है इसलिए गीता में भगवान ने कहा- ‘हे अर्जुन ,मैं सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म अणु से भी सूक्ष्म हूँ ‘ इसलिए परमात्मा सर्वशक्तिमान है।

५. सर्वज्ञ अर्थात सब कुछ जानने वाला। परमात्मा सृष्टि के आदि-मध्य-अंत का ज्ञान देते।मनुष्यों को एक सेकण्ड आगे ही नहीं पता क्या होगा। इसलिए परमात्मा को सर्वज्ञ कहते हैं।
  🌸 इन्हें त्रिमूर्ति भी कहते हैं क्योंकि वह ब्रह्मा, विष्णु और शंकर के भी रचयिता हैं।

🌸 वेद में यजुर्वेद (16/41 )तथा उपनिषदों में मुंडक उपनिषद्( 7 )इत्यादि वाक्यों के आधार पर भी लोग परमात्मा का नाम “शिव” मानते हैं। उपनिषद के इस वाक्य में कहा गया है कि परमात्मा को इंद्रियों द्वारा देखा या ग्रहण नहीं किया जा सकता ,वह अचिंत्य है और अद्वितीय है ,जानने योग्य है उसका नाम ‘शिव’ है।

 

 

🌸 गीता 📕 (17/23,8/13 और 9/17) में उनके लिए ‘ओंकार’ नाम भी आया है।भारत में ओंकारेश्वर नाम से जो भी मंदिर है वह भी शिव ही का है ।’ओम ‘शब्द को बहुत से लोग ब्रह्मा, विष्णु और शंकर के रचयिता का वाचक मानते हैं। अतः शिव त्रिमूर्ति हैं वह देव -देव है(10/15 गीता)।गीता में उन्हें प्रभविष्णु (ब्रह्मा), ग्रसिविष्णु (शंकर) तथा भर्तु(विष्णु )तीनों द्वारा कार्य करवाने वाला ज्योतियों की भी ज्योति कहा है।(गीता 13/17)

🌸परमात्मा ☝अमूल्य (अनमोल), अप्रमाण, अगोचर, आदि मध्य अंत रहित, नित्य निर्मल, ज्योतिस्वरूप, अशरीरी, अजन्मा, अभोक्ता, अहिंसक है, कल्याकारी, परम पूज्य, परम पिता, मंगलकारी है। मगर परमात्मा अकर्ता नहीं है। परमात्मा पतित को पावन, दुःख से छुड़ा सुख, शांति की दुनिया में ले जाता है इसलिए वो कर्ता कहलाता है।

 

३. परमात्मा के गुण

जैसे आपको बताया की आत्मा के सात गुण हैं। पवित्रता, प्रेम, शांति, सुख, ज्ञान, आंनद, शक्ति ।

वैसे ही परमात्मा इन सात गुणों के सागर हैं।

🌸 परमात्मा ज्ञान का सागर है।
🌸 परमात्मा शांति का सागर है।
🌸 परमात्मा आनंद का सागर है।
🌸 परमात्मा सुख का सागर है।
🌸 परमात्मा पवित्रता का सागर है।
🌸 परमात्मा शक्तियों का सागर है।
🌸 परमात्मा प्रेम का सागर है।

“परमात्मा रुप में बिंदु और गुणों में सिंधु ” अर्थात परमात्मा रूप ज्योतिबिंदु स्वरुप है लेकिन गुणों से भरपूर है।आत्मा में एक गुण ज्यादा और दूसरा कम हो सकता है, लेकिन परमात्मा तो सदाकाल सभी गुणों से भरपूर रहते हैं।
तालाब या नदी में पानी की मात्रा कम और ज्यादा हो सकती है लेकिन सागर(ocean) में कभी पानी कम नहीं होता।

४. परमात्मा का निवास स्थान

🌸आज भी हम दु:खी होते हैं तो मदद के लिये ऊपर की ओर देखते है। गुरुनानक साहेब, क्राइस्ट, साईबाबा सबकी ऊँगली ☝ऊपर की तरफ दिखाते हैं।
🌸 परमात्मा का निवास इस भौतिक जगत से बहुत ऊपर है जहाँ शांति का साम्राज्य है l पदार्थ और विचारों के क्षेत्र से परे यह एक पदार्थ रहित, स्थान रहित, मापरहित स्थल है। यह सर्वाधिक पवित्र व सर्वोत्तम स्थल है।

🌸 परमात्मा सर्वव्यापी नहीं है। पत्थर ठिक्कर आदि में नहीं है।

🌸 उनका निवास स्थान परमधाम है। इसे परलोक ,ब्रह्मलोक, शिवपुरी, मुक्तिधाम, शान्तिधाम, निर्वाणधाम, सचखण्ड, शिवधाम, सातवाँ आसमान आदि नामों से पुकारा गया है।

🌸 परमधाम इस स्थूल दुनिया से परे, सूर्य – चाँद🌙से भी पार है।

🌸 विज्ञान भी मानता है कि आकाश से ऊपर एक ऐसा स्थान है जहाँ बहुत ऊर्जा है, जहां से सृष्टि को ऊर्जा मिलती है। यही स्थान है परमात्मा के रहने का, चांद सितारों🌘 से भी पार।

५. परमात्मा का कर्तव्य

▪ कोई कहता है परमात्मा की मर्ज़ी के बिना पत्ता 🍃भी नहीं हिलता इसलिए दु:ख का कारण वही है।
एक छोटा बच्चा काँच की वस्तु व जो नुकसान पहुँचाये ऐसी वस्तु से खेलता हो तो, उसकी माँ तुरंत उसके हाथ से वो वस्तु छीन लेती है। क्योंकि उसे बच्चे की फ़िक्र है।तो क्या परमात्मा जिनके हम सब बच्चे हैं वो हमे दुःख, बीमारी दे सकते हैं ❓❓

परमात्मा क्या करते हैं 

 

 



” कई बार हम कह देते सब कुछ भगवान ही तो करता है।”

▪ किसी के घर में कोई घटना हो गई। बहुत किसी के साथ बुरा हो गया। हम कहते भगवान ने इसके साथ बहुत बुरा किया। कई बार हम ऐसा सुनते । भगवान को इनके साथ इतना बुरा नहीं करना चाहिए था…
लेकिन वास्तव में भगवान कहते ये सब मैं नहीं करता हूँ। अगर भगवान किसी का बुरा करे तो उसे भगवान ही कौन कहे। बुरा करने वाले की तो हम शक्ल भी देखना पसंद नहीं करते और भगवान की तो एक झलक पाने के लिए इतना तरसते हैं।भगवान बुरा करे ,तो उससे मिलने के लिए हम क्यों तरसते हैं।भगवान कभी किसी का बुरा नहीं करता। ये जो बुरा हुआ ये कोई न कोई हमारे ही कर्म का फल है। भगवान को दोष नहीं देना चाहिए। भगवान ये सब नहीं करता।

▪ कई बार हम कह देते भगवान की मर्जी के बिना तो एक पत्ता🍃भी नहीं हिल सकता। ये भी बोलते हैं।अब भगवान कहते ये भी मैं नही करता।अगर सबकुछ मैं करता तो दुनिया में इतना पाप ,भ्रस्टाचार हो रहा, चोरी हो रही, कोई मार रहा तो क्या ये सब मैं करा रहा हूँ।अगर ये सब कुछ भगवान कराये तो उसका फल भी भगवान भोगे फिर मनुष्य दुःखी क्यों।भगवान कहता ये सब भी मैं नहीं करता।

▪ कई जगह प्राकृतिक आपदाएं आ गयी, बाढ़ आ गयी ,भूकम्प आ गया तो भी हम भगवान को दोष देने लग जाते हैं।भगवान कहते ये भी मैं नहीं करता ये भी प्रकृति का काम है मेरा काम नहीं है।

तो भगवान क्या करता है

 

 

भगवान कहते मैं वो कार्य करता हूँ जो कोई मनुष्य आत्मा नहीं करती।वो कार्य क्या है। वो हैं :
🌸 आज की इस बिगड़ी हुई दुनिया को नई बनाना।
🌸 इस पतित दुनिया को पावन बनाना।
🌸 इस दु:खधाम को सुखधाम बनाना।
🌸 पाप आत्माओं को देव आत्मा बनाना।
ये कार्य कोई मनुष्य कर सकता है?? नहीं।
ये कार्य सिर्फ परमात्मा ही करता है।
तब कहते – ” ऊँचा तेरा नाम ,ऊँचा तेरा धाम ,ऊँचा तेरा काम “

ये कार्य कोई भी नहीं कर सकता।चाहे कोई महान आत्मा हो चाहे कोई भी हो कोई नहीं कर सकता।इस बिगड़ी को बनाने वाला, इस पतित दुनिया को पावन बनाने वाला , पाप आत्माओं को देव आत्मा बनाने वाला इस सृष्टि में भगवान के सिवाय और कोई नहीं कर सकता।

🌸 दुनिया में सुख शांति लाने का काम एक परमात्मा ही कर सकते हैं।

▪ इस कलियुगी तथा पतित दुनिया को पावन बनाकर सतयुग की स्थापना  सिर्फ परमात्मा ही कर सकता है।

परमात्मा के तीन मुख्य कर्तव्य हैं

१. ब्रह्मा द्वारा नई सृष्टि 🌐की स्थापना,
२. शंकर द्वारा पुरानी आसुरी सृष्टि का विनाश।
३. विष्णु के द्वारा नई सृष्टि 🌏की पालना।

परमात्मा सर्वधर्मात्माओं के पिता है

अलग-अलग धर्म ग्रंथो द्वारा परमात्मा के स्वरूप और धाम  के बारे में क्या कहा गया

 

 

गीता अध्याय(8/9)उसमें लिखा है परमात्मा ने अपने स्वरूप के बारे में बताया” मेरा रुप अणु से भी सूक्ष्म है और अचिंत्य है और सूर्य वर्ण और ज्योति स्वरूप है “इससे स्पष्ट है कि भगवान भी आत्माओं की तरह ही एक ज्योति बिंदु ही है।

गीता 📕(अध्याय 13/17)में परमात्मा ने कहा कि” मैं ज्योतियों का भी परम ज्योति हूँ” और उन्होंने अपने धाम के बारे में भी बताया कि उनके धाम में भी अव्यक्त ब्रह्म नामक प्रकाश है उनका धाम अव्यक्त धाम है गीता (अध्याय 8/20-21)में हम देख सकते हैं।

मनुस्मृति (1/9 )में लिखा है सृष्टि के आरंभ में एक अंड प्रकट हुआ वह हजारों सूर्य के समान तेजस्वी और प्रकाशमान था।

 यजुर्वेद 32/2 का वचन है “सर्वे निमिषा जज्ञिरे विघुत पुरुषादधि “अर्थात वह विद्युतपुरुष (ज्योतिर्लिंग )प्रकट हुआ जिससे निमेष ,कला आदि का प्रारंभ हुआ।

 शिव पुराण धर्म संहिता (2/63- 64) में लिखा है कलयुग के अंत में प्रलय काल में एक अद्भुत ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ वह पहले अग्नि के समान ज्वालयमान था अथवा तेजोमय था वह ना घटता था ना बढ़ता था ।वह अनुपम था वह अव्यक्त था और उस द्वारा ही सृष्टि का आरंभ हुआ था।

ईसाइयों के धर्म ग्रंथ बाइबिल तौरेत (अ 1,श्लो 2-4 )में लिखा है कि “ईश्वर की आत्मा जल पर डोलता था” अर्थात ईश्वर भी हमारी ही तरह आत्मस्वरूप आत्मा ही है।

कुरान में भी कहा गया है:- “अल्लाहू नरुस्मा बाते बलार्द
नुरुनाल्लानुर” सुराह no. 24 यानि खुदा का चेहरा नुरानी है वो नूर सातो आसमानों तक फैला है वो ही नूर मोमिन के दिलों मे नूरों का भी नूर है।

▪ हम मंदिरो में दीपक जलाते हैं, MOSQUE में चिराग, CHURCH में मोमबत्ती और गुरद्वारे में प्रकाश किया जाता है।

 श्री गुरु नानक देव जी परमात्मा के धाम और उनके स्वरूप के विषय में क्या कहते हैं।
“पसरी किरणि ज्योति उजाला ।करि करि देखै आपि दयाआला ।।अनहद रुन झुनकार सदा धुनि निरभऊ कै घरि वायिदा।।”
अर्थात:- उस परमात्मा से अथाह प्रकाश निकल रहा है और शब्द की ध्वनि निकल रही है।

 विज्ञान और परमात्मा

 

 

इसी तरह साइंटिस्ट भी एक शक्ति द्वारा ही सृष्टि की रचना को स्वीकार करते हैं परंतु वह शक्ति को चेतन ज्ञान रूप और इच्छा रूप नहीं मानते क्योंकि साइंस के पास इस शक्ति को अनुभव करने की सामर्थ्य ही नहीं है।

📕आक्सफोर्ड शब्दकोश में, गॉड सर्वोच्च सत्ता की परिभाषा एक ऐसे पारलौकिक सत्ता के रूप में दी गई है जो ब्रह्मांड का निर्माता एवं इसका संचालक है।

▪ अल्बर्ट आइंस्टाइन जर्मन मूल के वैज्ञानिक  नोबल पुरस्कार प्राप्त लिखते हैं कि
“जो अभेद्द है उसका भी अस्तित्व है l”
जैसे हम बगीचे में जाते हैं वहाँ फूलों 🌹की महक की अनुभूति तो हम करते हैं लेकिन महक दिखाई नहीं देती हैl इसी प्रकार हमें ईश्वर इन आँखों से दिखाई नहीं देते हैं लेकिन उनकी अनुभूति हम कर सकते हैं।

▪ जैसे वैज्ञानिकों🚀के द्वारा अति सूक्ष्म न्यूट्रान व साइसोन कणों की खोज की है लेकिन उन्हें इन खुली आँखों से नहीं देख सकते l उन्हें देखने के लिए यंत्रों🔬की आवश्कता होती है। उसी तरह परमात्मा का रूप ज्योतिर्बिंदु है l परमात्मा सूक्ष्मातिसूक्ष्म ज्योति कण है l उस दिव्य ज्योतिर्मय रूप को दिव्य चक्षुओं के द्वारा ही देखा जा सकता है।

▪ जब आत्मा आत्मिक रूप में परमात्मा से जुड़ती है तब चूंकि परमात्मा शक्तियों, कलाओं, मूल्यों व ज्ञान के स्त्रोत हैं l आत्मा इन सबसे भरपूर होती जाती है l परमात्मा से हमें यह सब कैसे प्राप्त होता है??

 



▪ जिस प्रकार केमिकल कंपोनेंट्स अस्त-व्यस्त होने पर बैटरी डिस्चार्ज होती है और करंट मिलने से कंपोनेंट्स व्यवस्थित हो जाते हैं l और बैटरी रिचार्ज हो जाती है l उसी प्रकार परमात्मा जो शक्तियों के स्त्रोत हैं, उनसे मन बुद्धि को जोड़ना होता है।राजयोग मैडिटेशन चार्जर है और परमात्मा रूपी करंट जो दिखाई नहीं देता परन्तु धीरे-धीरे हमारे अंदर सुव्यवस्था अर्थात् सोचना, बोलना व करना इसमें सुसंवादिता आती है l इस तरह आत्मा में बदलाव आ जाता है।

▪ आत्मा की पॉवर कम हो जाती है लेकिन परमात्मा की पॉवर कभी कम नहीं होती,वो एकरस है। जिसे science कहती है कि जब  energy form change नहीं करती तब energy same रहती है। इसलिए परमात्मा कभी शरीर नहीं लेते इसलिए उनकी एनर्जी same रहती है।

▪ आत्मा परिवर्तनशील है क्योंकि यह  जन्म- मरण के चक्र में आती अर्थात energy converts into other form…लेकिन परमात्मा अपरिवर्तनशील है क्योंकि वे जन्म- मरण के चक्र में नही आते…अर्थात…he is that supreme energy which does not convert into other form.

 

 

परमात्मा का परिचय(सारांश)

१. परमात्मा के नाम — ‘सदाशिव’ जेहोवा, गॉड, अल्लाह ,सिद्धशिलापति , चिनकुनसेकी, वाहेगुरु , सबका मालिक☝एक।

२. परमात्मा का दिव्य स्वरुप –अति सूक्ष्म दिव्य ज्योतिबिंदु🌟रूप, नूर , प्रकाश, लाइट।

३. परमात्मा की योग्यता –सर्व धर्म मान्य, सर्वोच्च, सर्वोपरि , सर्वज्ञ , सर्वगुण में अनन्त सर्वशक्तिमान।

४. परमात्मा का निवास स्थान –ब्रह्मलोक, परमधाम, निर्वाणधाम , शांतिधाम,मूलवतन में रहने वाला ईश्वर ।

५. परमात्मा का दिव्य कर्तव्य — अधर्म का नाश और सत्य धर्म की स्थापना।

बहुत से लोग शिव और शंकर को एक ही मानते हैं, परन्तु वास्तव में इन दोनों में भिन्नता है। आप देखते हैं कि दोनों की प्रतिमायें भी अलग-अलग आकार वाली होती हैं। शिव की प्रतिमा अण्डाकार अथवा अंगुष्ठाकार होती है जबकि महादेव शंकर जी की प्रतिमा शारीरिक आकार वाली होती है।यहाँ उन दोनों का अलग-अलग परिचय, जोकि परमपिता परमात्मा शिव ने अब स्वयं हमे समझाया है तथा अनुभव कराया है स्पष्ट किया जा रहा है । इसे हर किसी को समझने की जरूरत है। इसे समझने के बाद ही श्रद्धालुओं को उसके अनुरूप ही पूजा अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान करना चाहिए

“शिव और शंकर में महान अन्तर”

परमात्मा शिव ज्योति बिंदु है, जबकि शंकर जी का शारीरिक आकार है।

शिव परमात्मा सारी सृष्टि के रचयिता हैं, जबकि शंकर जी स्वयं शिव की रचना है।

▪जैसे गुजरात में रिवाज है कि बच्चे के साथ बाप का नाम भी जोड़ा जाता है ताकि पता चल जाये कि यह फलाने का बेटा है….जैसे उदाहरण के तौर पर महात्मा गांधी का नाम मोहन दास था। लेकिन पूरा नाम मोहन दास कर्मचंद गांधी कहते हैं क्योंकि कर्मचंद उनके पिता जी का नाम था ताकि पता चल जाये यह फलाने का बेटा है। वैसे शिव शंकर कहते अर्थात शंकर जी भी शिव का बच्चा है..






एक बात ध्यान देने योग्य है कि शास्त्रो में सभी देवी-देवता के मात- पिता दिखाये गए। लेकिन परमपिता परमात्मा शिव के कोई मात-पिता नहीं दिखाये गए क्योंकि स्वयं शिव पूरे जगत के खुद मात-पिता हैं उनका एक और बहुत प्यारा नाम शम्भू है यानि स्वयं धरा पर आने वाले….

▪ शिव परमात्मा को कल्याणकारी कहते हैं, जबकि शंकर जी को प्रलयकारी कहते हैं।

▪ परमात्मा शिव परमधाम(ब्रह्मलोक) वासी हैं, लेकिन शंकर जी सूक्ष्मवतन(सूक्ष्म देवलोक) वासी हैं।

▪परमात्मा शिव की प्रतिमा शिवलिंग के रूप में बताते हैं जबकि शंकर जी की प्रतिमा शारीरिक आकार की।

▪ शिव परमात्मा तो स्वयं रचयिता हैं, दाता हैं, उन्हें किसी की तपस्या करने की आवश्यकता नहीं, जबकि शंकर जी को सदा तपस्वी रूप में दिखाते हैं।

▪ शिव (परमात्मा) की प्रतिमा शिवलिंग सदा शंकर जी की प्रतिमा के आगे ही दिखाया जाता है। इसका अर्थ है शंकर जी सदा शिव की तपस्या करते थे। क्योंकि यदि शिव व शंकर एक होते तो क्या शंकर जी खुद की ही तपस्या कर रहे हैं। क्या कभी कोई स्वयं, स्वयं की ही तपस्या करेगा क्या ? यदि शंकर जी स्वयं परमात्मा हैं तो उन्हें किसी की तपस्या करने की क्या जरूरत?

▪परमात्मा शिव की प्रतिमा को शिवलिंग कहते हैं, शंकर लिंग नहीं कहते हैं।

▪परमात्मा शिव के अवतरण को शिवरात्रि कहते हैं न कि शंकर रात्रि।

▪ इसमें एक और अंतर है- ब्रह्मा
देवाए नम:, विष्णु देवाए नम:, शंकर देवाए नम: लेकिन परमात्मा शिव के लिये सदा शिव परमात्माए नम: कहा जाता है, कभी भी शिव देवताये नम: नहीं कहते। सदा शिव कहते, सदा शंकर नहीं कहते हैं।

▪ जब भी कोई मंत्र देते हैं तो वह ‘ओम नमः शिवाय’ का मंत्र देते हैं कभी ‘ओम नमः शंकराय’ का उच्चारण नहीं करते।

▪ शास्त्रों के अनुसार बताया गया है कि अमरनाथ में शंकर जी ने पार्वती जी को अमरनाथ की अमर कथा सुनाई थी ।अब शंकर जी ने पार्वती जी को कौन से अमरनाथ की कथा सुनाई कहने का भाव यह है कि अमरनाथ और शंकर जी एक है या अलग ।उस कथा के साक्षी रूप में वह दो कबूतर दिखाते हैं। अब अगर शंकर जी ने भी पार्वती जी को अमरनाथ की अमर कथा सुनाई तो इसका मतलब शंकर जी और अमरनाथ अलग हैं तभी तो कथा सुनाई ,नहीं तो पार्वती जी को तो पता ही होना चाहिए था ना? फिर सुनाने का मतलब ही क्या। अमरनाथ अर्थात वह अमर शिव परमात्मा।






▪ स्वयं शिव परमात्मा इन तीनों देवताओं द्वारा अपने तीन कर्तव्य कराते हैं। इसमें प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा नई सृष्टि की स्थापना, विष्णु द्वारा नई सतयुगी सृष्टि की पालना तथा शंकर जी के द्वारा पुरानी कलयुगी सृष्टि का विनाश। इससे जाहिर होता है कि शिव परमात्मा इन तीनों आकारी देवताओं के भी रचयिता हैं। इसलिए शिव परमात्मा को त्रिमूर्ति भी कहा जाता है।

▪ शिवपुराण में भी जब परमात्मा शिव के बारे में बताया जाता है तो उनको निराकार ज्योति स्तंभ स्वरूप ही बताया जाता है और सदाशिव नाम से ही पुकारा जाता है न की सदाशिव शंकर के नाम से।

▪ इससे स्पष्ट है कि शिव और शंकर में महान अंतर है।

शंकर का आध्यात्मिक रहस्य क्या है

▪▪ वास्तव में शंकरजी हम मनुष्यों का ही प्रतीकात्मक है। शंकर शब्द को English में hybrid कहते हैं। अर्थात हम मनुष्यों के अच्छे व बुरे कर्मों का प्रतीक है।

▪ शंकरजी का परिवार दिखाया है पार्वती गणेश कार्तिकेय, वैसे ही हमारा भी परिवार होता है।

▪ पांच सर्प विकारों  काम, क्रोध ,लोभ, मोह ,अहंकार का प्रतीक है जिन्होंने मनुष्य को ही काट कर नीला पीला कर दिया है।फिर सर्पों को गले की माला दिखाया है जिन विकारों को हम ही तपस्या द्वारा वश में कर गले की माला बना देते हैं।

▪ आज तांडव कौन मचा रहा है?
मनुष्य ही ना। विनाश का कारण मनुष्य स्वयं बना हुआ है। मनुष्य-मनुष्य का खून बहा रहा है। यही तांडव नृत्य है।

▪ शंकर की तीसरी आँख खुलना अर्थात आत्म ज्ञान द्वारा बुराइयों का विनाश होना है।

भक्ति में परमात्मा शिव की पूजा विधि का आध्यात्मिक रहस्य :

परमात्मा शिव पर अक धतूरा के कड़वे फूल चढ़ाने का अर्थ है मनुष्य अपने अंदर की कड़वाहट विकारों को प्रभु को अर्पण कर दे। विषय विकारों का जो विष है उसे सहन करने की सामर्थ्य केवल शिव पिता में ही है।
दूध चढ़ाने का अर्थ परमात्म आज्ञा पर पवित्रता को धारण करना है।

“शिव का जन्मोत्सव रात्रि में क्यों?”

🌌‘रात्रि’ वास्तव में अज्ञान, तमोगुण अथवा🗿 पापाचार की निशानी है।अत: द्वापरयुग और कलियुग के समय को ‘रात्रि’ कहा जाता है। कलियुग के अन्त में जबकि 🎅🏻साधू, सन्यासी, गुरु, आचार्य इत्यादि सभी मनुष्य 👥पतित तथा दुखी होते हैं और अज्ञान-निंद्रा में सोये पड़े होते हैं, जब धर्म की ग्लानी होती है और जब यह भारत विषय-विकारों के कारण वेश्यालय बन जाता है, तब पतित-पावन परमपिता परमात्मा 🌟शिव इस सृष्टि में दिव्य-जन्म लेते हैं इसलिए अन्य सबका जन्मोत्सव तो ‘जन्म दिन’ के रूप में मनाया जाता है परन्तु परमात्मा शिव के जन्म-दिन को ‘शिवरात्रि’ (Birth-night) ही कहा जाता है।

 




       ज्ञान-सूर्य 🌟शिव के प्रकट होने से सृष्टि से अज्ञान-अन्धकार तथा विकारों का 🌋नाश होता है।जब इस प्रकार अवतरित होकर ज्ञान-सूर्य परमपिता परमात्मा शिव ज्ञान-प्रकाश देते हैं तो कुछ ही समय में ज्ञान का प्रभाव सारे विश्व🌍में फ़ैल जाता है और कलियुग तथा तमोगुण के स्थान पर संसार में सतयुग और सतोगुण की स्थापना हो जाती है और अज्ञान-अन्धकार का तथा विकारों का विनाश हो जाता है।सारे कल्प में परमपिता परमात्मा शिव के एक अलौकिक जन्म से थोड़े ही समय में यह सृष्टि वेश्यालय से बदल कर शिवालय बन जाती है और नर को श्री नारायण पद तथा नारी को श्री लक्ष्मी पद की प्राप्ति हो जाती है ।इसलिए शिवरात्रि 💎हीरे तुल्य है।

परमात्मा ऊपर परमधाम से आते हैं इसका यादगार भक्ति मार्ग में यह है कि जब शिव मंदिर में शिवलिंग की स्थापना होती तो शिव पिंडी को दरवाजे से प्रवेश नहीं कराते बल्कि ऊपर गुम्बज से नीचे लाते है, बाद में गुम्बज का निर्माण किया जाता है।

 

 

ओम् शान्ती

 






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